
तेज धूप में गड्ढे खोदकर फोटोसेशन का खेल
पौधे जिएंगे या सिर्फ सरकारी बिल? सामाजिक वानिकरण विभाग के काम पर पर्यावरण प्रेमियो का गंभीर सवाल
हिमायतनगर, एम अनिलकुमार | बारिश नहीं… पानी नहीं… पौधे मृत… फिर भी वृक्षारोपण जारी! पर्यावरण बचाने के नाम पर सरकारी धन खर्च हो रहा है या ‘हरित’ कमाई का खेल चल रहा है? यह सवाल अब हिमायतनगर तहसील के पर्यावरण प्रेमी नागरिकों द्वारा उठाया जा रहा है।
शहर से नजदिक स्थित टेंभी पहाड क्षेत्र की सीमा पर सामाजिक वानिकरण विभाग द्वारा लगभग तीन से चार एकड़ क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जा रहा है। हालांकि, मौके पर लगाए जा रहे कई पौधे पहले से ही मृत अथवा बेहद खराब हालत में होने का गंभीर आरोप पर्यावरणप्रेमी नागरिकों ने लगाया है।

बारिश गायब… पानी की कोई व्यवस्था नहीं… फिर ये पौधे जिएंगे कैसे? यह सीधा सवाल अब संबंधित विभाग के ‘हरित’ कामकाज पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। आरोप है कि तेज धूप में जगह-जगह गड्ढे खोदे जा रहे हैं, मृत अथवा घटिया पौधों को जमीन में लगाया जा रहा है, फोटो खींचे जा रहे हैं और कागजों पर हजारों पौधे लगाए जाने का दावा कर सरकारी बिल निकालने की तैयारी की जा रही है।
‘पौधे लगाए’… लेकिन पानी कौन देगा? बांस, सागवान, नीलगिरी, इमली और धावड़ा सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए जा रहे हैं। लेकिन पौधों के संरक्षण और सिंचाई के लिए कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है, ऐसा नागरिकों का आरोप है। न पानी, न देखभाल… फिर यह वृक्षारोपण अभियान है या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

जमीन पर पौधे कितने और कागजों पर कितने? इसका जवाब अब सामाजिक वानिकरण विभाग को देना होगा। सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए लाखों रुपये का निधि उपलब्ध कराती है। लेकिन निधि खर्च होने के बाद वास्तव में कितने पौधे जीवित रहते हैं और कितने सूख जाते हैं, इसका हिसाब आखिर कौन देगा? यह सवाल अब जनता के सामने खड़ा है।
‘फोटो खिंचवाओ, फाइल तैयार करो और बिल उठाओ’ का आरोप
वृक्षारोपण पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी है, ‘फोटोसेशन करो और बिल उठाओ’ योजना नहीं, ऐसी तीखी प्रतिक्रिया पर्यावरणप्रेमी नागरिकों ने व्यक्त की है। सामाजिक वानिकरण विभाग के वन परिक्षेत्र अधिकारी दिनकर पाटील और सहयोगी अंबुलगेकर के माध्यम से किए जा रहे कार्यों की गुणवत्ता पर नागरिकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की प्रशासन द्वारा तत्काल जांच की जाए, ऐसी मांग जोर पकड़ रही है।

जांच पूरी होने तक भुगतान रोका जाए!
टेंभी क्षेत्र में किए गए वृक्षारोपण की प्रत्यक्ष माप की जाए, पौधों की गुणवत्ता की जांच हो, सिंचाई और संरक्षण की व्यवस्था का निरीक्षण किया जाए तथा खर्च किए गए सरकारी धन का लेखा परीक्षण किया जाए, ऐसी मांग की जा रही है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक संबंधित कार्यों के बिलों का भुगतान रोका जाए, ऐसी मांग भी अब जोर पकड़ रही है।
पर्यावरण के नाम पर यदि सरकारी खजाने की लूट हो रही है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के पैसे के साथ गंभीर धोखा है। अब कागजों पर दिखाई जाने वाली हरियाली नहीं, बल्कि टेंभी के पहाड पर मौजूद वास्तविक ‘हरित’ सच्चाई सामने आना जरूरी है। मृत पौधे लगाकर हरित क्रांति का दावा करने वाले सामाजिक वानिकरण विभाग के काम की जांच होगी? या जांच से पहले ही ‘हरित’ बिलों को हरी झंडी मिल जाएगी? अब इस पूरे मामले में प्रशासन क्या कार्रवाई करता है, इस पर हिमायतनगर तहसील के नागरिकों की नजरें टिकी हैं।
